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जीवनी

जीवनी

जन्म- दिनांक 18 फरवरी 1970 सदियापुर इलाहाबाद
शिक्षा- स्नातक (इलाहाबाद विश्व विद्यालय )
व्यवसाय- फल एवं गैस एजेंसी

पारिवारिक पृष्ठभूमि - पिता श्री अमरनाथ सोनकर फल व्यवसायी थे जो ठेले पर फल बेचने का काम करते थे.माता श्रीमती चम्पी देवी सोनकर गृहणी थी,घर मे मैं ,मेरे 3 भाई 2 बहने है.घर के काम काज के साथ गरीबी से संघर्ष करने के लिए मेरी माँ गोबर की कंडिया बनाकर आस पास के घरों में बेचती थी इस काम मे हम सब भाई बहन भी माँ का साथ देते थे।

प्रारम्भिक जीवन - साथियों गरीबी किसे कहते हैं ये आप सभी को पता होगा लेकिन गरीबी में जीना किसे कहते हैं ये मैंने अपने जीवन मे देखा है। सुबह प्राइमरी विद्यालय में पढ़ाई के बाद,दोपहर को ठेले पर फल बेचना और शाम होते ही दूसरे ठेले पर अंडा बेचा करता था ताकि अपनी पढ़ाई व घर के खर्चे निकाल सकूँ,लेकिन मैंने जीवन के उन दिनों में संघर्ष को हमेशा अपना साथी समझा,मुझे पता था कि एक न एक दिन मेरा ये साथी मुझे आगे बढ़ाएगा।

गरीबी का आलम ये था कि अतर्सुइया चौराहे पर जुते की दूकान में मैंने जूता बनाना सीखना शुरू कर दिया था,मुझे याद है वो दिन जब इलाहाबाद की प्रसिद्ध "पजावा रामलीला" के समय पेड़ों से गिरी इमली को बिन बिन कर बेचा करता था. मुझे आज भी वो दिन याद है जब जीवन मे पहली बार गुदड़ी बाजार से 5 रु में मैंने फुल पैंट खरीदी थी,यकीन मानिए साथियों मेरे जीवन का अब तक का सबसे खुशी का दिन था वो. स्कूल में किसी भी सरकारी स्कॉलरशिप को मैंने कभी भी स्वीकार नही किया ना ही कभी आवेदन किया क्योंकि मेरा मानना था कि एक बार स्कॉलरशिप की आदत पड़ गयी तो मेरी संघर्ष करने की आदत छूट जाएगी।

आज मैं भगवान की कृपा,माननीय मोदी जी के आशीर्वाद एवं क्षेत्र की जनता के प्रेम व सहयोग से सांसद बना हूँ लेकिन मेरे जीवन का संघर्ष मुझे हमेशा मेरे बचपन के उन दिनों की याद दिलाता रहता है जब महज़ कुछ रुपये ना होने के नाते मेरा जीवन समाप्त होने जा था.बचपन मे किसी बीमारी की वजह से पेशाब की नली में पत्थर आ गया जिससे नली बंद हो गयी थी और डॉक्टरों ने जल्द आपरेशन ही एक उपाय बताया जिसके लिए मेरे परिवार के पास रु नही थे। ऐसे कठिन दौर में ठेला बेचकर,घरों में कई कई महीनों के लिए काम करने की शर्त पर मेरी माँ ने लोगों से और अपने भाइयों से उधार मांग कर आपरेशन के लिए आवश्यक रु का प्रबंध कर मुझे नया जीवन दिया.

मैं नही भूल सकता उन दिनों को जब मैं सिर्फ 4 दर्जन केले खरीद कर उन्हें अपने सिर के ऊपर टोकरी में रख कर पहले फलमंडी और वहां ना बिकने पर घर घर जाकर बेचा करता था,4 दर्जन इसलिए क्योंकि इससे ज्यादा खरीदने के लिए पैसे नही होते थे मेरे पास. ठेले पर फल बेचना,अंडे बेचना जूते बनाना और त्योहारों के मौसम में घर घर जाकर सामान बेचने जैसे बहुत से काम अपनी गरीबी से लड़ने के लिए मैंने किये और अपने संघर्ष को जारी रखा.

साथियों मैंने कभी भी किसी भी काम को छोटा नहीं समझा और जब जिस समय जिस काम से 2 पैसे मिलने की आस होती मैं पूरे मन से उस काम मे लग जाता था. शायद मेरे उन दिनों के संघर्ष ने ही मुझे वो मानसिक मजबूती दी जिसकी वजह से में आज यहां आपके बीच आपने सेवक के रूप में उपस्थित हूँ.

अपनी इंटरमीडिएट की पढ़ाई इलाहाबाद के C.A.V.Inter College से पूरी कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। सन 2001 में प्रतापगढ़ में रहने वाली संगीता सोनकर से विवाह कर जीवन संगिनी बनाया. ये ईश्वर की कृपा रही कि जिस फल के छोटे से व्यापार ने बचपन मे रोटी दी,पढ़ाई के बाद उसी व्यापार ने मुझे आगे बढ़ाया. लेकिन एक बात जो हमेशा से मेरे दिल मे थी वो ये कि अपने समाज के लोगों के लिए जो आज उस स्थिति में हैं जिसमे कभी मैंने भी अपना जीवन बिताया था,उनके लिए मैं वो सब कुछ कर सकूँ जिससे उनके जीवन में गरीबी के अंधेरे को समृद्धि के प्रकाश से बदल सकूँ. इसके लिए अखिल भारतीय खटीक समाज से जुड़ा व लगातार कई वर्षों तक प्रदेश सचिव रहा।

आज भी सांसद के रूप में अपने समाज के लोगों के लिए अपने क्षेत्र के लोगों के लिए व अपने देश की सेवा के लिए तन मन व धन से समर्पित हूँ और आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आने वाले समय मे भी समर्पित रहूंगा।

जय हिंद ! जय भारत !
विनोद सोनकर



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